English translation forthcoming. Hindi original below.
श्रीप्रवोधानंद, बड़े रसिक आनन्दकन्द, श्री 'चेतन्यचन्द" जू के पारखद प्यारे हैं। राधाकृष्णकु जकेलि, निपट नवेलि कही, भोलि रसरूप, दोऊ किए हृग तारे हैं॥ बृन्दाबन बास को हुलास ले प्रकाश . कियो, दियो सुखसिंधु, कर्म धर्म सब दारे हैं। ताही सुनि सुनि कोदि कोटि .जन रंग पायो, बिपिन सुहायों बसे तन मन वारे हैं॥६१३॥ ( १७) क् भक्तिसुधास्वाद तिलक | व्ध्३ वात्तक लक। श्रीप्वोधानन्दजी बड़े ही रंसिक आनन्दकन्द श्रीकृष्णचतन्यजी के प्रिय पाषद थे। श्रीरा धाकृष्ण कु जकेलि अति नवीन वर्णन किया ओर रूपरस को पान कर युगलचन्द को अपने नेत्रों के तारे कर लिये। आपने अपने काव्य में श्रीृृन्दावनवास के उल्लास का प्रकाश कर उपासकों को सुखसिधु में मग्न किया और कमे थम को न्यारे करदिया। उस ग्रंथ को सुन २ के करोड़ों लोगों ने प्रेमरेंंग को पाया। आपने . 'स्वयम सुन्दर श्रीवृन्दावन में बसके तन मन धन सब न्यवद्धावर करदिये॥
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